Saturday, 30 April 2011

जनहित में कानून

जनहित नाहीत ही बना रहे इसके लिए न्यायालयों ने कुछ गियिद लाईने बनाई है अदालत ब्लोग्पोस्त के जरिये से यह खबर देखे.


अब उत्तरप्रदेश हाईकोर्ट या उसकी उसकी लखनऊ बेंच में हर व्यक्ति या हर संस्था की ओर जनहित याचिका नहीं दायर की जा सकेगी। जनहित याचिका (पीआईएल) दायर करने के लिए याचिकाकर्ता अथवा संस्था को अपनी विश्वसनीयता और जनहित से जुड़े उसके कार्यो आदि का विस्तृत उल्लेख हलफनामा के मार्फत करना होगा तभी अदालत उसकी याचिका पर सुनवाई करेगी। यानी अब जनहित याचिका दाखिल करना आसान नहीं होगा।

उच्च न्यायालय ने हाईकोर्ट रूल्स 1952 के अध्याय 22 में संशोधन कर नियम एक में उपनियम 3ए को शामिल कर लिया है। हाईकोर्ट ने अपने इस रूल्स में नया संशोधन संविधान के अनुच्छेद 225 में उसे प्रदत्त शक्तियों का उपयोग करते हुए किया है। यह नया संशोधन 1 मई 2010 को किया गया।

हाई कोर्ट ने उक्त संशोधन दायर हो रही जनहित याचिकाओं के दुरुपयोग पर अंकुश लगाने के उद्देश्य से किया है। अब इस नये नियम के मुताबिक जब कोई व्यक्ति हाईकोर्ट अथवा उसकी लखनऊ बेंच में जनहित याचिका दायर करेगा तो उसे पहले इस आशय का हलफनामा कोर्ट में देना होगा कि उस व्यक्ति या याचिकाकर्ता का संक्षिप्त परिचय क्या है।

याचिकाकर्ता को अपना परिचय देने के साथ-साथ अपनी विश्वसनीयता और जनहित का कार्य, जो वह याचिका में उठा रहा है उसे भी हलफनामा के मार्फत सबसे पहले स्पष्ट करना होगा। इसके अलावा हलफनामा में यह भी बताना होगा कि उसका इस याचिका को दायर करने में कोई व्यक्तिगत हित नहीं है। हलफनामा इस बात का भी देना होगा कि जनहित याचिका में किसी प्रकार का आदेश पारित होने पर तो उसे स्वयं और ही उसके किसी संबंधी को कोई लाभ होगा। आगे यह भी हलफनामा में स्पष्ट करना होगा कि याचिका में पारित आदेश से न तो किसी व्यक्ति विशेष, समुदाय अथवा राज्य का नुकसान होगा।

उक्त सभी बातें यदि याची ने अपनी याचिका में स्पष्ट नहीं की है तो उसकी याचिका की पोषणीयता नहीं होगी और अदालत उस पर विचार ही नहीं करेगी। यह संशोधन हाईकोर्ट ने अपने नियमों में इस वजह से किया क्योंकि सुप्रीमकोर्ट ने अभी हाल ही में उत्तराखंड राज्य के केस में देश के सभी हाईकोर्ट को पीआईएल के दुरुपयोग को रोकने के लिए कहा था

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